वक़्त के शैलाब में, जाने क्या-क्या बह गया,
हमसफ़र दरिया बनाया, फिरभी प्यासा रह गया।
किस क़दर नज़दीकियां मुझको समंदर की खलीं,
जलता घर, दीवार, छत, ये किस्सा सारा कह गया।
जब सुलगते पत्थरों पर, पा बरहना चल दिए,
नक़्शेपा की हर कहानी, ज़ख्मो-छाला कह गया।
तुमसे मिलना फिर बिछड़ना, याद है सबकुछ मुझे,
कैसे कह दूँ मैं अभी से, क्या गया क्या रह गया।
जब मिले फुरसत 'अदब' तफ़सील से करना हिसाब,
किसकी कितनी देनदारी, किसका कितना रह गया।
हमसफ़र दरिया बनाया, फिरभी प्यासा रह गया।
किस क़दर नज़दीकियां मुझको समंदर की खलीं,
जलता घर, दीवार, छत, ये किस्सा सारा कह गया।
जब सुलगते पत्थरों पर, पा बरहना चल दिए,
नक़्शेपा की हर कहानी, ज़ख्मो-छाला कह गया।
तुमसे मिलना फिर बिछड़ना, याद है सबकुछ मुझे,
कैसे कह दूँ मैं अभी से, क्या गया क्या रह गया।
जब मिले फुरसत 'अदब' तफ़सील से करना हिसाब,
किसकी कितनी देनदारी, किसका कितना रह गया।
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